A) पंथ का प्रतिनिधित्व करने वाले नेताओं की बढ़ती संख्या, लेकिन सामूहिक नेतृत्व की कमी।
B) राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का मीरी-पीरी और पंथ सेवा के मूल सिद्धांतों पर हावी हो जाना।
C) पंथक राजनीतिक बहसों और आम पंजाबी की प्राथमिकताओं, रोज़गार, शिक्षा, नशा, कृषि और सुशासन, के बीच बढ़ती दूरी।
D) पंथक नेतृत्व का आपसी सहमति न बना पाना, जिससे आंतरिक विभाजन उसकी सबसे बड़ी राजनीतिक कमज़ोरी बनता जा रहा है।